प्रात फरवरी सात की

प्रात फरवरी सात की , सिसकियों में बात की पलकों में जमी धूल को , धो दिया।

भूल को रहने दिया, अपने हृदय में, शूल को रहने दिया। उनके हृदय में। रक्त लेकिन बह चला, मेरे हृदय से। वेदना की ताप से , शोणित मेरा था खौलता। वक्त के अभिशाप से, ये प्रण मेरा था डोलता।

बह चला फिर आंख से वाष्पित लहू मेरे हृदय का। गर्म निर्झर हो कि जैसे, श्रोत हो उनके उदय का।

हृदय मेरा निस्तब्ध था जैसे कि ढलता सूर्य हो। मन मेरा अशांत था जैसे कि बजता तूर्य हो।

विलग वे मुझसे हुए, जैसे कि जल में तेल हो। तोड़कर ऐसे गए जैसे कि कोई खेल हो।

तुम्हारे नेह से सींचा गया, वो पुष्प अब मुरझा गया है प्रेम अब तेरा मुझे , जाने कहाँ उलझा गया है। :सुमन शेखर