Hindi Kavita by Prachi

तुम्हारे मुख से निकले शब्द और मेरे जीवन में संगीत की एक ही भाषा है, तुम शब्द बिखेरते हो और मैं उन्हें सुर के धागों में पिरो देती हूॅं, जिसे जब चाहे मैं कंठहार बना सकती हूॅं और जब चाहे उस से कर्णप्रिय तान छेड़ सकती हूॅं। तुम्हारे मुख से निकले शब्द और मेरे जीवन की हर भोर का एक ही रूप है। तुम्हारे शब्दों को मैं सूर्य में टांक देती हूॅं, वह भोर की लालिमा की भांति ऑंखों को ठंडक और मन को आशाओं से भर देती है। तुम्हारे मुख से निकले शब्द और मेरे जीवन के सुख पर्यायवाची हैं। तुम्हारे शब्दों को मैं अपनी साड़ी की खूंट में बांध लेती हूॅं, मगर यह भी सुखों सी चंचलता लिए निकल पड़ते हैं किसी और खूंट की खोज में। ~ प्राची प्रणम्या

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