*आलता*















एक स्टील की कटोरी और कटोरी में भरा रक्तवर्ण आलता, उस आलते से जाने कैसी अद्भुत रचना की लालसा

उस लालसे में उसने घूरा लाल तरल उस रंग को, उंगली डूबी टप से उसमें, लिपटी रंग में बेढंग हो

फिर बेढंगी से ऐड़ी पर लकीर खिंची एक लाल-सी, आड़े-,तिरछे घुमाव से तलवे की परिधि घिरी कमाल थी!

हर नख को ऐसे रंगे वो, जैसे खिल रही हो कोई कली लाली भरी उँगलियाँ थी, या थी उत्सव से छिटकी कोई गली

गोल सी बिंदियां सजीं फिर दोनों पाँवों में मध्य में, ऊषा की मानो सेज बिछी हो कोमल चरणों के अर्घ्य में।

चौड़ी चमकती आँखें निहारे अपने पैरों की सुर्खी मायल बस मिल जाती कही से चमकीली दो चांदी की पायल

टखनों पे छनक सजाने को वो उठा ध्यान से, धीरे से कमीज़ में पोछकर हाथों को, दाढ़ी सहलाई करीने से।

माँ के श्रृंगार का बक्सा लाने जब कमरे से निकलना उसने चाहा, मुँह के बल गिर गया ज़मीं पे, हर अंग ने उसके कराहा!

जो नज़र टिकाई ज़मीन पर वो दर्पण बन चिल्लाई थी, “तुम मर्द हो! तुम मर्द हो!” और मर्दानगी शरमाई थी

पीड़ा से, अवसाद से लज्जा से आँखें मींचता सीने के बल पे वो पड़ा अश्रु बहाता, चीखता- “मैं क्या करूँ कि मर्दों की तरह न दर्द सहूँ होके घायल! मैं क्या करूँ कि न भाए मुझे ये आलता ये सुंदर पायल!”

वो सिसक-सिसक के चुप हुआ सुनने को दर्पण की वाणी, पर शून्य में तकता रह गया क्योंकि दर्पण ने चुप्पी तानी।

केहुनी से कसकर दर्पण पे उसने निराशा भरा प्रहार किया, छिटक गए टुकड़े-टुकड़े हर टुकड़े ने धिक्कार दिया।

कस के पकड़कर मुट्ठी बांधी और खत्म की ये मौन लड़ाई, उस शीशे के टुकड़े से उसने चीर डाली अपनी कलाई।

फिर रक्त बहा जो झर-झर करके वो पोत गया हर अंग को और चूमा बहकर के पैरों के आलते के रंग को।

खत्म थी आँखें खत्म थी कला की लालसा बंद हुई साँस और बह गया आलता।

-प्रतीची