लम्हे

जिनमें तुम रहो, मैं रहूँ और ठण्ड की सरसराहट हो, चाय की प्यालियाँ ठंडी हो जाए, बातों में बस गर्माहट हो।

जिनमें तुम रहो, मैं रहूँ और सावन की पहली बारिश हो, ना छावनी हो, ना छाता हो और भीगने की भी ख्वाहिश हो।

लम्हें, जिनमे तुम रहो, मैं रहूँ और गर्मी की ढलती शाम हो, ना फ़ोन हो, ना बिजली हो, ना करने को कुछ काम हो।

जिनमें मैं रहूँ, तुम रहो और पल भर की ख़ामोशी हो, नज़रों से गुफ़्तगू हो सारी, बस उनसे ही मदहोशी हो।

बस तुम रहो, मैं रहूँ और एक लम्हा मैं ऐसा पा सकूं, जिसमें मैं तुम्हे इस दिल के, सौ किस्से सुना सकूं।

Rituraj

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