‘बचपन’

आज मीत मैं गीत लिखूँगा कंचे और गिल्ली डंडे की जीत लिखूंगा।

नदी, रेत और खेत लिखूंगा मेड़,आम का पेड़ लिखूँगा। और लिखूंगा रोज शाम गायों का वापस आना बचपन मेरे ! बस एक बार फिर आना ।

अनंत डुबकियाँ बाल सखा संग, इंद्रधनुष और होली के रंग, धूल भरी कच्ची सड़कों पर सरपट दौड़ लगाना। बचपन मेरे! बस एक बार फिर आना ।

पापा की तब पकड़ उंगलियां दीवाली की सब फुलझड़ियां खुशी खुशी फिर मेरे खातिर सब खरीद कर लाना बचपन मेरे! बस एक बार फिर आना ।

सर्द शाम आलाव जलाना बैठ सभी से गप्प मिलाना फिर देर रात माँ की गोदी में सर रख कर सो जाना। बचपन मेरे! बस एक बार फिर आना ।

:सुमन शेखर वेद।

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