सफेद आज मेरे शब्द हैं

आँख अश्रु संग जीते हैं। पानी अंग संग मिट्टी बने, शृंगार नयन संग फरियादी बने। आवाज़ मेरी भीतर रुकी, झूठे पत्थरों से टकरा वो जा सूखी। भटक ली लोगों के भिन्न भिन्न दुकान अकारण गिरा नहीं उस उत्सुक पतंग का मकान। रोने वालों की मंज़िल नहीं, याद बात मुसाफिर की रही। १ दिन सवेरा का हाथ थामे मुसाफिर का दिया गम भुलाते उज्जवल कोने का संज्ञान लेते आखिरकार उड़ चला पतंग देर सवेरे॥

Tanya Sahay

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