वैश्य

हारे पथिक की राह में, समय के उल्टे प्रवाह में, वो बेच रही है खुद को, बस सुनहरे भविष्य की चाह में ।

नीचे की गयी निगाह में, वक़्त बेवक़्त उठती आह में, सपने संजोती वो कल के दयनीय परिस्तिथियों में ढ़ल के कच्ची उम्र में जल के पार कर रही भंवर बड़ा संभल के ।

यहाँ आने से पहले ज़िन्दगी बड़ी गुलज़ार थी, आज जो नंगा है बदन उसपे ऊपर कुरता नीचे सलवार थी, लेकिन, उसे उम्मीद है की एक दिन वो आज़ाद होगी, कल नहीं तो कुछ रोज़ बाद होगी । तब उसके शरीर में केवल जिस्म नहीं जान भी होगी, तब कमरा नंबर 36 नहीं नाम और पहचान भी होगी, वो बहुत कुछ करेगी ज़िन्दगी बसर करने को, पर लौटेगी नहीं इस हैवानियत में, फिर सफर करने को ।

वो कई साल कोशिश करती रही, बेहिसाब कोशिश करती रही, कई ज़ुल्म ढहाए गये उसपे, पर वो चुप चाप सब सहती रही ।

लेकिन, एक दिन उसका धीरज टूट गया, वो उम्मीद का जो धागा था,हाथ से छूट गया, वो डूबने लगी अंधकार की स्याह में, कुछ दिन बाद पता चला मर गयी वो आत्मदाह में, हारे हुए पथिक की राह में, समय के उल्टे प्रवाह में ।

-Deval Tripathi