बस अब उड़ने दो

बस अब उड़ने दो,

जी गयी सुकून से 9 महीने जिस कोख में,

बाहर आते ही क्यों मार दी जाती है?

क्या हक़ नही उसका खुली हवा में उड़ के जीने का,

सिर्फ इसलिए क्योंकि वो एक लड़की कहलाती है?

क्या गुनाह है उस मासूमियत का,

जो हज़ारो उमंगे ले इस दुनिया में आती है,

ख्वाबो उमंगो कर यूँ राख राख, वो मासूम तो हैवानो के हाथ जला दी जाती है!

देते है बेतुके बहाने उसे बहा देने के,

काली राखो मे उसे दफना देने  के,

माँ अपनी उस पीड़ा को सुनाये जाती है,

पर कोस कोस कर गुमसुम ही अत्याचार सह जाती है!

एक मौका देकर तो देख ऐ हैवान,

सर ऊंचा कर, बादलो की सैर कराएगी ये नन्ही सी जान,

बेटा न बनता बुढ़ापे का सहारा माँ बाप का,

बेटी तो कुँवारे ही रह सब संभाल ले जाती है,

पगई के घर जाके भी, गैरो को अपना बना ले जाती है,

रोशन नाम माँ-बाप का,वो तो बस करती जाती है!

जीने दे न उसे भी तू आज़ादी से,

वो भी तो औरो के जैसा पंख फैला कर उड़ना चाहती है।

मन तो शायद उसका भी करता होगा कुछ करने का,

इतनी आज़ादी तो पंछियो को भी दी जाती है।

वो तो फिर एक सपना है उन्न आंखों का जो,

खुद जलकर,आंधो को रोशनी दे जाती है।

वो भी तो एक लड़की ही थी,जिसकी कोख से जन्मा ये भगवान,

ज़िंदिगी देती है वो माँ, जो जन्मी थी एक लड़की के यहां।

बेटी तो माँ बाप को ताउम्र वफ़ा देती है,

विपदा पड़ने पर खुद को भी मिटा देती है,

पर बच गयी उस कोख से तो, खुद की सास ही उसे जला देती है,

जाके उस हैवान को भी बता दे कोई,

की वो भी एक दुर्गा के कोख से ही जन्म पाती है।।

Priyam Shrivastava

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