ऐसा क्यों होता है?

ऐसा क्यों होता है, चढ़ती हैं मज़ारों पर चादरें हज़ार। बाहर बैठा कोई भिखारी ठंड से मर जाता है।।

ऐसा क्यों होता है, बनती है उस मुरती के लिए भोग ढ़ेर। बाहर सोया वो इंसान दो वक्त की रोटी के लिए तड़प जाता है।।

ऐसा क्यों होता है, किताबों में तो शब्दें होती हैं। पर लोगों के चेहरों पर किताबों से ज़्यादा लिखा होता है।।

ऐसा क्यों होता है, कि सब कहते तो हैं कि सत्य को अंत में जीत जाना है। फिर भी सत्यवादियों का अक्सर ज़्यादा अपमान होता है।।

ऐसा क्यों होता है, कि हर इंसान कभी ना कभी हारता है। फिर भी दूसरों की हार पर मजाक अक्सर बनाया जाता है।।

ऐसा क्यों होता है, देते हैं हम जिन्हें बेवक्त सहारा। कई बार कितना आसान होता है उनके लिए हमें गैर बनाना।।

ऐसा क्यों होता है, जलाते हैं दीप हम अंधकार को दूर करने को। मन में न जाने कितने रावणों को पाले बैठे रहते हैं।।

ऐसा क्यों होता है, देने में दहेज़ की राशि कितनी ज्यादा लगती है। लेने समय इतने कम में अपना काम ही नहीं चलता है।।

ऐसा क्यों होता है, फेसबुक पर जन्मदिन मुबारक करते हैं सैकडों। गले मिलकर खुशियां बांटने वाला एक नहीं मिलता है।।

Shreya Sinha

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