एक खता

सोई तू भूखी जिससे दिल मेरा न रोये

उसकी नाराज़गी से देखो न माँ आज दिनों हो गए भूका सोये

रातों में जग जग कर तू मुझे सहलाती थी

नींद तेरी टूटती पर मुझे प्यार से सुलाती थी

माँ, कुछ सुनाऊँगी तो क्या सुनेगी

थक कर हार गईं हूँ

क्या मेरी हार में मेरे साथ रहेगी।

माँ तेरे वो कदम मेरे कानों में गूंजते है

हिचकोली मार मार ये दिल रो पड़ता है

सुकून पहला सा ढूँढ़ने को कहीं चल पड़ता है माँ

कहीं तो निकल पड़ता है

माँ , सुन न माँ वो सितारा बहुत टिम टिम करता है

लगता है मुझे रोता देख तेरा दिल भी बहुत मचलता है

माँ, सितारा बन कर भी तू मुझे पुकारती

इसलिए तो देखो न माँ आज कल हिचकी भी बहुत आती है

बेसब्री जो तेरी आँखें लिखती

बया मैंने किसी और को कर दी ।

धोका तुझसे ये बर्दाश्त न हुआ

और तू मुझसे मुँह मोड़ के चल दी

क्या करूँ माँ वो प्यार खोकला निकला

जिसके लिए तुझे ठुकराया

वो ही ठोकर  दे कर गुज़रा

इस खाता की ही तो सज़ा है न माँ

तू आज मेरी दहलीज का नही उस आसमान का

हिस्सा है

माँ बोल दे इस आसमान से

बोल दे इन बादलों से

छोड़ दे तुझे कुछ पल के लिए

क्यों बादलों से टूटकर मेरे पास नही आ जाती

क्या करूँ माँ, तू आज कल बहुत याद आती माँ

तू बहुत याद आती!!

लुक्का छुपी तो महज एक खेल था न माँ

तू छुपती मैं ढूँढ़ती मैं छुपती तू ढूँढ़ती

तूने तो उसे सच समझ लिया माँ

पर्दे के पीछे छुपती तो पकड़ लेता

अब इस नीले अम्बर का परदा कैसे हटाऊँ

नीली चादर ओढे सोई इस लम्बी नींद से तुझे कैसे जगाऊँ।।

Priyam Shrivastava

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