अंजाम-ए-इश्क़

मरीज़ ए इश्क में इंसान जाने क्या क्या न करे, करे दुआ खुदा से या हर हस्पताल से दवा करे। मेहबूब के दीदार में जो चैन मिले आशिक को, फिर क्यों मंदिर में पूजा ,क्यों मस्ज़िद में इल्तेज़ा करे।

मैं बरस जाउँ बून्द बून्द बन कर बादल से तुम एक दफा धानक बनने को राजी तो हो मैं खोल दूंगा हर राज खुदका तेरे आगे मेरे सीने का ये दिल मेरा काज़ी तो हो तुझे यूँ ही लिखूंगा अल्फाजों में हर बारी उम्र भर के लिए कलम से बांध लूंगा तुझे खुद को हार जाऊँ पर तुम्हे जीत लूंगा तुझे हिस्सा बना लूं तेरे नाम की कोई बाजी तो हो

शुभम शेषांक